श्मशान की मिट्टी ने आवाज़ उठाई

गाँव का नाम था कालिंजर।
श्मशान घाट गाँव से दो किलोमीटर दूर था। वहाँ न दीवारें टूटी हुई थीं, काँटों के जंगल उगे थे, बारिश में कीचड़ और गर्मी में धूल। लाशें आतीं तो रिश्तेदार रोते-रोते भी नाक पर रुमाल रखते। बच्चे तो दूर से ही डर जाते। लोग कहते, “अरे, मरने के बाद कौन जाएगा वहाँ सुधार करने?”

एक दिन शहर से लौटा एक नौजवान—नाम था अर्जुन शर्मा।
इंजीनियर था, अच्छी नौकरी छोड़कर गाँव आया था क्योंकि उसकी माँ अचानक चल बसी थीं।
माँ की चिता जलाते समय अर्जुन ने देखा—चिता के लिए लकड़ियाँ भी ठीक से नहीं थीं। पानी का नल टूटा हुआ, छाँव तक नहीं। एक बूढ़ा अकेला चिता तैयार कर रहा था, उसकी कमर झुकी हुई थी।

अर्जुन ने माँ की अस्थियाँ गंगा में विसर्जित करने के बाद कुछ नहीं कहा। बस श्मशान में ही बैठ गया। रात भर बैठा रहा।

सुबह जब लौटा तो गाँव की पंचायत में खड़ा हो गया।
बोला, “मैंने माँ को अंतिम विदाई दी, लेकिन वह विदाई सम्मानजनक नहीं थी।
हम अपने घरों में एसी लगाते हैं, बच्चों के लिए पार्क बनाते हैं,
पर जहाँ हमारा अंतिम ठिकाना है, वहाँ कीचड़ और काँटे हैं।
क्या यह हमारी संस्कृति है?”

लोग चुप रहे।
अर्जुन ने फिर कहा, “मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता।
लेकिन अगर हर घर से एक ईंट और एक दिन की मजदूरी दे,
तो हम यह श्मशान ऐसा बना देंगे कि मरने वाला भी शांति महसूस करे।”

पहले लोग हँसे।
फिर एक बूढ़ी दादी ने कहा, “बेटा, तू सही कह रहा है।
मेरे पति को जब लाए थे, मैं फिसल कर गिर गई थी कीचड़ में।
मैं अपनी पेंशन के पैसे दूँगी।”

बस, बात फैल गई।

तीन महीने बाद जो हुआ, वह गाँव ने कभी सोचा भी नहीं था।

  • बच्चों ने स्कूल की छुट्टी में काँटे काटे, कचरा उठाया।
  • औरतों ने हर रविवार को श्मशान में झाड़ू लगाई।
  • नौजवानों ने पक्का रास्ता बनाया, पेड़ लगाए।
  • एक रिटायर्ड फौजी ने कहा, “मैं अंतिम परेड भी साफ-सुथरी होनी चाहिए”
    और खुद बगीचा बनवाया।
  • शहर में काम करने वाले लड़कों ने ऑनलाइन फंड इकट्ठा किया,
    वहाँ छायादार प्रतीक्षालय बना, पानी की टंकी लगी,
    अंतिम संस्कार के लिए मुफ्त लकड़ी का गोदाम बना।
  • सबसे खास बात—श्मशान के बीच में एक छोटा-सा मंदिर बनाया गया,
    जिसके सामने पत्थर पर लिखा गया:

“यह जगह मृत्यु की नहीं,
जीवन के अंतिम सम्मान की है।
इसे स्वच्छ और सुंदर रखना
हमारा जीवित रहते हुए कर्तव्य है।”

आज कालिंजर का श्मशान इतना सुंदर है कि लोग शाम को वहाँ टहलने आते हैं।
बच्चे पेड़ों के नीचे खेलते हैं।
और जब भी कोई अंतिम यात्रा निकलती है,
तो लोग कहते हैं—“चलो, अब उसे सम्मान से विदा करें।”

अर्जुन अब भी गाँव में है।
हर महीने की अमावस्या को वह श्मशान जाता है,
झाड़ू लगाता है, फूल चढ़ाता है।
लोग पूछते हैं, “अब तो सब बन गया, फिर क्यों आते हो?”

वह मुस्कुराकर कहता है,
“माँ यहाँ नहीं हैं, लेकिन उनकी आत्मा को लगता है
कि उनका बेटा अब भी उनके पास है।
और मुझे लगता है—
जब तक यह जगह साफ रहेगी,
माँ का आशीर्वाद बना रहेगा।”

श्मशान चुप है।
पर अब उसकी चुप्पी में सम्मान है,
और उस सम्मान को जीवित लोग रोज नया करते हैं।

क्योंकि अंतिम सत्य का पहला कदम यह है कि
हम मृत्यु को भी इज्जत देना सीख लें।
तब जीवन अपने आप सम्मानजनक हो जाता है।

Leave a Comment